श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.22.12

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

उद्यतस्य हि कामस्य प्रतिवादो न शस्यते।

अपि निर्मुक्तसंगस्य कामरक्तस्य किं पुनः॥ १२

udyatasya hi kāmasya prativādo na śasyate|

api nirmuktasaṃgasya kāmaraktasya kiṃ punaḥ|| 12

अर्थ

जो भोग स्वतः प्राप्त हो जाय, उसकी अवहेलना करना विरक्त पुरुषको भी उचित नहीं है; फिर विषयासक्तकी तो बात ही क्या है॥ १२॥

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