श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.22.11

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

तत्प्रतीच्छ द्विजाग्र्येमां श्रद्धयोपहृतां मया।

सर्वात्मनानुरूपां ते गृहमेधिषु कर्मसु॥ ११

tatpratīccha dvijāgryemāṃ śraddhayopahṛtāṃ mayā|

sarvātmanānurūpāṃ te gṛhamedhiṣu karmasu|| 11

अर्थ

द्विजवर! मैं बड़ी श्रद्धासे आपको यह कन्या समर्पित करता हूँ, आप इसे स्वीकार कीजिये। यह गृहस्थोचित कार्योंके लिये सब प्रकार आपके योग्य है॥ ११॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें