श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.22.17

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

यां हर्म्यपृष्ठे क्‍वणदङ्‌घ्रिशोभां

विक्रीडतीं कन्दुकविह्वलाक्षीम्।

विश्वावसुर्न्यपतत्स्वाद्विमाना-

द्विलोक्य सम्मोहविमूढचेताः॥ १७

yāṃ harmyapṛṣṭhe kvaṇadaṅghriśobhāṃ

vikrīḍatīṃ kandukavihvalākṣīm|

viśvāvasurnyapatatsvādvimānā-

dvilokya sammohavimūḍhacetāḥ|| 17

अर्थ

एक बार यह अपने महलकी छतपर गेंद खेल रही थी। गेंदके पीछे इधर-उधर दौड़नेके कारण इसके नेत्र चंचल हो रहे थे तथा पैरोंके पायजेब मधुर झनकार करते जाते थे। उस समय इसे देखकर विश्वावसु गन्धर्व मोहवश अचेत होकर अपने विमानसे गिर पड़ा था॥ १७॥

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