श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.22.18

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

तां प्रार्थयन्तीं ललनाललाम-

मसेवितश्रीचरणैरदृष्टाम् ।

वत्सां मनोरुच्चपदः स्वसारं

को नानुमन्येत बुधोऽभियाताम्॥ १८

tāṃ prārthayantīṃ lalanālalāma-

masevitaśrīcaraṇairadṛṣṭām |

vatsāṃ manoruccapadaḥ svasāraṃ

ko nānumanyeta budho'bhiyātām|| 18

अर्थ

वही इस समय यहाँ स्वयं आकर प्रार्थना कर रही है; ऐसी अवस्थामें कौन समझदार पुरुष इसे स्वीकार न करेगा? यह तो साक्षात् आप महाराज श्रीस्वायम्भुवमनुकी दुलारी कन्या और उत्तानपादकी प्यारी बहिन है; तथा यह रमणियोंमें रत्नके समान है। जिन लोगोंने कभी श्रीलक्ष्मीजीके चरणोंकी उपासना नहीं की है, उन्हें तो इसका दर्शन भी नहीं हो सकता॥ १८॥

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