ऐसे सुन्दर घरको भी जब देवहूतिने बहुत प्रसन्न चित्तसे नहीं देखा तो सबके आन्तरिक भावको परख लेनेवाले कर्दमजीने स्वयं ही कहा—॥ २२॥ ‘भीरु! तुम इस बिन्दुसरोवरमें स्नान करके विमानपर चढ़ जाओ; यह विष्णुभगवान्का रचा हुआ तीर्थ मनुष्योंको सभी कामनाओंकी प्राप्ति करानेवाला है’॥ २३॥✎ 1963
यह व्याख्या श्लोक 3.23.22 से 3.23.23 तककी एक साथ है।
ईदृग्गृहं तत्पश्यन्तीं नातिप्रीतेन चेतसा।
सर्वभूताशयाभिज्ञः प्रावोचत्कर्दमः स्वयम्॥ २२
ऐसे सुन्दर घरको भी जब देवहूतिने बहुत प्रसन्न चित्तसे नहीं देखा तो सबके आन्तरिक भावको परख लेनेवाले कर्दमजीने स्वयं ही कहा—॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.23.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 348) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/23/22/
टिप्पणियाँ
३
प्रा० पा०—इत्थं गृहं तस्य पश्यन्नतिप्रीतेन।
(मुद्रित पृष्ठ 348)
४
प्रा० पा०—प्रोवाच कर्दमः।
(मुद्रित पृष्ठ 348)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1963 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): कहा— → कहा—॥