श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.23.6

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

कर्दम उवाच

तुष्टोऽहमद्य तव मानवि मानदायाः

शुश्रूषया परमया परया च भक्‍त्या।

यो देहिनामयमतीव सुहृत्स्वदेहो

नावेक्षितः समुचितः क्षपितुं मदर्थे॥ ६

tuṣṭo'hamadya tava mānavi mānadāyāḥ

śuśrūṣayā paramayā parayā ca bhaktyā|

yo dehināmayamatīva suhṛtsvadeho

nāvekṣitaḥ samucitaḥ kṣapituṃ madarthe|| 6

अर्थ

कर्दमजी बोले—मनुनन्दिनि! तुमने मेरा बड़ा आदर किया है। मैं तुम्हारी उत्तम सेवा और परम भक्तिसे बहुत सन्तुष्ट हूँ। सभी देहधारियोंको अपना शरीर बहुत प्रिय एवं आदरकी वस्तु होता है, किन्तु तुमने मेरी सेवाके आगे उसके क्षीण होनेकी भी कोई परवा नहीं की॥ ६॥

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