श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.23.7

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

ये मे स्वधर्मनिरतस्य तपःसमाधि-

विद्यात्मयोगविजिता भगवत्प्रसादाः।

तानेव ते मदनुसेवनयावरुद्धान्

दृष्टिं प्रपश्य वितराम्यभयानशोकान्॥ ७

ye me svadharmaniratasya tapaḥsamādhi-

vidyātmayogavijitā bhagavatprasādāḥ|

tāneva te madanusevanayāvaruddhān

dṛṣṭiṃ prapaśya vitarāmyabhayānaśokān|| 7

अर्थ

अतः अपने धर्मका पालन करते रहनेसे मुझे तप, समाधि, उपासना और योगके द्वारा जो भय और शोकसे रहित भगवत्प्रसाद-स्वरूप विभूतियाँ प्राप्त हुई हैं, उनपर मेरी सेवाके प्रभावसे अब तुम्हारा भी अधिकार हो गया है। मैं तुम्हें दिव्य-दृष्टि प्रदान करता हूँ, उसके द्वारा तुम उन्हें देखो॥ ७॥

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