श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.24.42

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

व्रतं स आस्थितो मौनमात्मैकशरणो मुनिः।

निःसंगो व्यचरत्क्षोणीमनग्‍निरनिकेतनः॥ ४२

vrataṃ sa āsthito maunamātmaikaśaraṇo muniḥ|

niḥsaṃgo vyacaratkṣoṇīmanagniraniketanaḥ|| 42

अर्थ

वहाँ अहिंसामय संन्यास-धर्मका पालन करते हुए वे एकमात्र श्रीभगवान्‌की शरण हो गये तथा अग्‍नि और आश्रमका त्याग करके निःसङ्गभावसे पृथ्वीपर विचरने लगे॥ ४२॥✎ 311

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #311 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् की → श्रीभगवान्‌की

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