श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.24.44

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

निरहंकृतिर्निर्ममश्‍च निर्द्वन्द्वः समदृक् स्वदृक्।

प्रत्यक्प्रशान्तधीर्धीरः प्रशान्तोर्मिरिवोदधिः॥ ४४

nirahaṃkṛtirnirmamaśca nirdvandvaḥ samadṛk svadṛk|

pratyakpraśāntadhīrdhīraḥ praśāntormirivodadhiḥ|| 44

अर्थ

वे अहंकार, ममता और सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंसे छूटकर समदर्शी (भेददृष्टिसे रहित) हो, सबमें अपने आत्माको ही देखने लगे। उनकी बुद्धि अन्तर्मुख एवं शान्त हो गयी। उस समय धीर कर्दमजी शान्त लहरोंवाले समुद्रके समान जान पड़ने लगे॥ ४४॥✎ 311

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #311 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् की → श्रीभगवान्‌की

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