॥ श्रीहरिः ॥
वासुदेवे भगवति सर्वज्ञे प्रत्यगात्मनि।
परेण भक्तिभावेन लब्धात्मा मुक्तबन्धनः॥ ४५
vāsudeve bhagavati sarvajñe pratyagātmani|
pareṇa bhaktibhāvena labdhātmā muktabandhanaḥ|| 45
अर्थ
परम भक्तिभावके द्वारा सर्वान्तर्यामी सर्वज्ञ श्रीवासुदेवमें चित्त स्थिर हो जानेसे वे सारे बन्धनोंसे मुक्त हो गये॥ ४५॥✎ 312
वासुदेवे भगवति सर्वज्ञे प्रत्यगात्मनि।
परेण भक्तिभावेन लब्धात्मा मुक्तबन्धनः॥ ४५
परम भक्तिभावके द्वारा सर्वान्तर्यामी सर्वज्ञ श्रीवासुदेवमें चित्त स्थिर हो जानेसे वे सारे बन्धनोंसे मुक्त हो गये॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.24.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 356) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/24/45/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #312 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्को