इच्छाद्वेषविहीनेन सर्वत्र समचेतसा।
भगवद्भक्तियुक्तेन प्राप्ता भागवती गतिः॥ ४७
इस प्रकार इच्छा और द्वेषसे रहित, सर्वत्र समबुद्धि और भगवद्भक्तिसे सम्पन्न होकर श्रीकर्दमजीने भगवान्का परमपद प्राप्त कर लिया॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.24.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 356) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/24/47/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#312 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्को