श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.25.35

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

पश्यन्ति ते मे रुचिराण्यम्ब सन्तः

प्रसन्‍नवक्‍त्रारुणलोचनानि ।

रूपाणि दिव्यानि वरप्रदानि

साकं वाचं स्पृहणीयां वदन्ति॥ ३५

paśyanti te me rucirāṇyamba santaḥ

prasannavaktrāruṇalocanāni |

rūpāṇi divyāni varapradāni

sākaṃ vācaṃ spṛhaṇīyāṃ vadanti|| 35

अर्थ

मा! वे साधुजन अरुण नयन एवं मनोहर मुखारविन्दसे युक्त मेरे परम सुन्दर और वरदायक दिव्य रूपोंकी झाँकी करते हैं और उनके साथ सप्रेम सम्भाषण भी करते हैं, जिसके लिये बड़े-बड़े तपस्वी भी लालायित रहते हैं॥ ३५॥

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