॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.25.34
नैकात्मतां मे स्पृहयन्ति केचिन्-
मत्पादसेवाभिरता मदीहाः।
येऽन्योन्यतो भागवताः प्रसज्य ✎ 1885
सभाजयन्ते मम पौरुषाणि॥ ३४
naikātmatāṃ me spṛhayanti kecin-
matpādasevābhiratā madīhāḥ|
ye'nyonyato bhāgavatāḥ prasajya
sabhājayante mama pauruṣāṇi|| 34
अर्थ
मेरी चरणसेवामें प्रीति रखनेवाले और मेरी ही प्रसन्नताके लिये समस्त कार्य करनेवाले कितने ही बड़भागी भक्त, जो एक-दूसरेसे मिलकर प्रेमपूर्वक मेरे ही पराक्रमोंकी चर्चा किया करते हैं, मेरे साथ एकीभाव (सायुज्यमोक्ष) की भी इच्छा नहीं करते॥ ३४॥