॥ श्रीहरिः ॥
ज्ञानवैराग्ययुक्तेन भक्तियोगेन योगिनः।
क्षेमाय पादमूलं मे प्रविशन्त्यकुतोभयम्३॥ ४३
jñānavairāgyayuktena bhaktiyogena yoginaḥ|
kṣemāya pādamūlaṃ me praviśantyakutobhayam|| 43
अर्थ
योगिजन ज्ञान-वैराग्ययुक्त भक्तियोगके द्वारा शान्ति प्राप्त करनेके लिये मेरे निर्भय चरणकमलोंका आश्रय लेते हैं॥ ४३॥
ज्ञानवैराग्ययुक्तेन भक्तियोगेन योगिनः।
क्षेमाय पादमूलं मे प्रविशन्त्यकुतोभयम्॥ ४३
योगिजन ज्ञान-वैराग्ययुक्त भक्तियोगके द्वारा शान्ति प्राप्त करनेके लिये मेरे निर्भय चरणकमलोंका आश्रय लेते हैं॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.25.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 361) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/25/43/टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—कुतोभयाः।
(मुद्रित पृष्ठ 361)