एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां निःश्रेयसोदयः।
तीव्रेण भक्तियोगेन मनो मय्यर्पितं स्थिरम्॥ ४४
संसारमें मनुष्यके लिये सबसे बड़ी कल्याणप्राप्ति यही है कि उसका चित्त तीव्र भक्तियोगके द्वारा मुझमें लगकर स्थिर हो जाय॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.25.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 361) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/25/44/