श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.20

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

विश्‍वमात्मगतं व्यंजन् कूटस्थो जगदङ्कुरः।

स्वतेजसापिबत्तीव्रमात्मप्रस्वापनं तमः॥ २०

viśvamātmagataṃ vyaṃjan kūṭastho jagadaṅkuraḥ|

svatejasāpibattīvramātmaprasvāpanaṃ tamaḥ|| 20

अर्थ

लय-विक्षेपादि रहित तथा जगत‍्के अंकुररूप इस महत्तत्त्वने अपनेमें स्थित विश्‍वको प्रकट करनेके लिये अपने स्वरूपको आच्छादित करनेवाले प्रलयकालीन अन्धकारको अपने ही तेजसे पी लिया॥ २०॥

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