श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.19

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

दैवात्क्षुभितधर्मिण्यां स्वस्यां योनौ परः पुमान्।

आधत्त वीर्यं सासूत महत्तत्त्वं हिरण्मयम्॥ १९

daivātkṣubhitadharmiṇyāṃ svasyāṃ yonau paraḥ pumān|

ādhatta vīryaṃ sāsūta mahattattvaṃ hiraṇmayam|| 19

अर्थ

जब परमपुरुष परमात्माने जीवोंके अदृष्टवश क्षोभको प्राप्त हुई सम्पूर्ण जीवोंकी उत्पत्तिस्थानरूपा अपनी मायामें चिच्छक्तिरूप वीर्य स्थापित किया, तो उससे तेजोमय महत्तत्त्व उत्पन्‍न हुआ॥ १९॥

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