श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.18

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

अन्तः पुरुषरूपेण कालरूपेण यो बहिः।

समन्वेत्येष सत्त्वानां भगवानात्ममायया॥ १८

antaḥ puruṣarūpeṇa kālarūpeṇa yo bahiḥ|

samanvetyeṣa sattvānāṃ bhagavānātmamāyayā|| 18

अर्थ

इस प्रकार जो अपनी मायाके द्वारा सब प्राणियोंके भीतर जीवरूपसे और बाहर कालरूपसे व्याप्त हैं, वे भगवान् ही पचीसवें तत्त्व हैं॥ १८॥✎ 318

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #318 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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