मनुपुत्रि! जिनकी प्रेरणासे गुणोंकी साम्यावस्थारूप निर्विशेष प्रकृतिमें गति उत्पन्न होती है, वास्तवमें वे पुरुषरूप भगवान् ही ‘काल’ कहे जाते हैं॥ १७॥✎ 318
प्रकृतेर्गुणसाम्यस्य निर्विशेषस्य मानवि।
चेष्टा यतः स भगवान् काल इत्युपलक्षितः॥ १७
मनुपुत्रि! जिनकी प्रेरणासे गुणोंकी साम्यावस्थारूप निर्विशेष प्रकृतिमें गति उत्पन्न होती है, वास्तवमें वे पुरुषरूप भगवान् ही ‘काल’ कहे जाते हैं॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 363) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/26/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#318 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने