कुछ लोग कालको पुरुषसे भिन्न तत्त्व न मानकर पुरुषका प्रभाव अर्थात् ईश्वरकी संहारकारिणी शक्ति बताते हैं। जिससे मायाके कार्यरूप देहादिमें आत्मत्वका अभिमान करके अहंकारसे मोहित और अपनेको कर्ता माननेवाले जीवको निरन्तर भय लगा रहता है॥ १६॥✎ 318
प्रभावं पौरुषं प्राहुः कालमेके यतो भयम्।
अहङ्कारविमूढस्य कर्तुः प्रकृतिमीयुषः॥ १६
कुछ लोग कालको पुरुषसे भिन्न तत्त्व न मानकर पुरुषका प्रभाव अर्थात् ईश्वरकी संहारकारिणी शक्ति बताते हैं। जिससे मायाके कार्यरूप देहादिमें आत्मत्वका अभिमान करके अहंकारसे मोहित और अपनेको कर्ता माननेवाले जीवको निरन्तर भय लगा रहता है॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 363) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/26/16/
टिप्पणियाँ
१
प्रा० पा०—प्रधानं पुरुषं प्रा०।
(मुद्रित पृष्ठ 363)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#318 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने