श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.32

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

तामसाच्च विकुर्वाणाद्भगवद्वीर्यचोदितात्।

शब्दमात्रमभूत्त२स्मान्‍नभः श्रोत्रं तु शब्दगम्॥ ३२

tāmasācca vikurvāṇādbhagavadvīryacoditāt|

śabdamātramabhūttasmānnabhaḥ śrotraṃ tu śabdagam|| 32

अर्थ

भगवान्‌की चेतनशक्तिकी प्रेरणासे तामस अहंकारके विकृत होनेपर उससे शब्दतन्मात्रका प्रादुर्भाव हुआ। शब्दतन्मात्रसे आकाश तथा शब्दका ज्ञान करानेवाली श्रोत्रेन्द्रिय उत्पन्‍न हुई॥ ३२॥✎ 321

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—तत्‍त्वन्‍नभः।

    (मुद्रित पृष्ठ 365)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #321 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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