॥ श्रीहरिः ॥
तामसाच्च विकुर्वाणाद्भगवद्वीर्यचोदितात्।
शब्दमात्रमभूत्त२स्मान्नभः श्रोत्रं तु शब्दगम्॥ ३२
tāmasācca vikurvāṇādbhagavadvīryacoditāt|
śabdamātramabhūttasmānnabhaḥ śrotraṃ tu śabdagam|| 32
अर्थ
भगवान्की चेतनशक्तिकी प्रेरणासे तामस अहंकारके विकृत होनेपर उससे शब्दतन्मात्रका प्रादुर्भाव हुआ। शब्दतन्मात्रसे आकाश तथा शब्दका ज्ञान करानेवाली श्रोत्रेन्द्रिय उत्पन्न हुई॥ ३२॥✎ 321
तामसाच्च विकुर्वाणाद्भगवद्वीर्यचोदितात्।
शब्दमात्रमभूत्तस्मान्नभः श्रोत्रं तु शब्दगम्॥ ३२
भगवान्की चेतनशक्तिकी प्रेरणासे तामस अहंकारके विकृत होनेपर उससे शब्दतन्मात्रका प्रादुर्भाव हुआ। शब्दतन्मात्रसे आकाश तथा शब्दका ज्ञान करानेवाली श्रोत्रेन्द्रिय उत्पन्न हुई॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 365) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/26/32/टिप्पणियाँ
- २
प्रा० पा०—तत्त्वन्नभः।
(मुद्रित पृष्ठ 365)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #321 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की