tanmātratvaṃ ca nabhaso lakṣaṇaṃ kavayo viduḥ|| 33
अर्थ
अर्थका प्रकाशक होना, ओटमें खड़े हुए वक्ताका भी ज्ञान करा देना और आकाशका सूक्ष्म रूप होना—विद्वानोंके मतमें यही शब्दके लक्षण हैं॥ ३३॥✎ 321
अर्थाश्रयत्वं शब्दस्य द्रष्टुर्लिंगत्वमेव च।
तन्मात्रत्वं च नभसो लक्षणं कवयो विदुः॥ ३३
अर्थका प्रकाशक होना, ओटमें खड़े हुए वक्ताका भी ज्ञान करा देना और आकाशका सूक्ष्म रूप होना—विद्वानोंके मतमें यही शब्दके लक्षण हैं॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 365) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/26/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)