श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.34

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

भूतानां छिद्रदातृत्वं बहिरन्तरमेव च।

प्राणेन्द्रियात्मधिष्ण्यत्वं नभसो वृत्तिलक्षणम्॥ ३४

bhūtānāṃ chidradātṛtvaṃ bahirantarameva ca|

prāṇendriyātmadhiṣṇyatvaṃ nabhaso vṛttilakṣaṇam|| 34

अर्थ

भूतोंको अवकाश देना, सबके बाहर-भीतर वर्तमान रहना तथा प्राण, इन्द्रिय और मनका आश्रय होना—ये आकाशके वृत्ति (कार्य) रूप लक्षण हैं॥ ३४॥✎ 321

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #321 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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