श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.35

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

नभसः शब्दतन्मात्रात्कालगत्या विकुर्वतः।

स्पर्शोऽभवत्ततो वायुस्त्वक् स्पर्शस्य च संग्रहः॥ ३५

nabhasaḥ śabdatanmātrātkālagatyā vikurvataḥ|

sparśo'bhavattato vāyustvak sparśasya ca saṃgrahaḥ|| 35

अर्थ

फिर शब्दतन्मात्रके कार्य आकाशमें कालगतिसे विकार होनेपर स्पर्शतन्मात्र हुआ और उससे वायु तथा स्पर्शका ग्रहण करानेवाली त्वगिन्द्रिय (त्वचा) उत्पन्‍न हुई॥ ३५॥✎ 321

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #321 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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