श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.37

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

चालनं व्यूहनं प्राप्तिर्नेतृत्वं द्रव्यशब्दयोः।

सर्वेन्द्रियाणामात्मत्वं वायोः कर्माभिलक्षणम्॥ ३७

cālanaṃ vyūhanaṃ prāptirnetṛtvaṃ dravyaśabdayoḥ|

sarvendriyāṇāmātmatvaṃ vāyoḥ karmābhilakṣaṇam|| 37

अर्थ

वृक्षकी शाखा आदिको हिलाना, तृणादिको इकट्ठा कर देना, सर्वत्र पहुँचना, गन्धादियुक्त द्रव्यको घ्राणादि इन्द्रियोंके पास तथा शब्दको श्रोत्रेन्द्रियके समीप ले जाना तथा समस्त इन्द्रियोंको कार्यशक्ति देना—ये वायुकी वृत्तियोंके लक्षण हैं॥ ३७॥✎ 321

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #321 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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