श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.27.25

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बह्वनर्थभृत्।

स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते॥ २५

yathā hyapratibuddhasya prasvāpo bahvanarthabhṛt|

sa eva pratibuddhasya na vai mohāya kalpate|| 25

अर्थ

जैसे सोये हुए पुरुषको स्वप्नमें कितने ही अनर्थोंका अनुभव करना पड़ता है, किन्तु जग पड़नेपर उसे उन स्वप्नके अनुभवोंसे किसी प्रकारका मोह नहीं होता॥ २५॥✎ 323 1597

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #323 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने
  • #1597 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ब्रह्मलोक-पर्यन्त → ब्रह्मलोकपर्यन्त

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें