उसी प्रकार जिसे तत्त्वज्ञान हो गया है और जो निरन्तर मुझमें ही मन लगाये रहता है, उस आत्माराम मुनिका प्रकृति कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती॥ २६॥✎ 3231597
एवं विदिततत्त्वस्य प्रकृतिर्मयि मानसम्।
युंजतो नापकुरुत आत्मारामस्य कर्हिचित्॥ २६
उसी प्रकार जिसे तत्त्वज्ञान हो गया है और जो निरन्तर मुझमें ही मन लगाये रहता है, उस आत्माराम मुनिका प्रकृति कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.27.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 372) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/27/26/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#323 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने