श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.19

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

स्थितं व्रजन्तमासीनं शयानं वा गुहाशयम्।

प्रेक्षणीयेहितं ध्यायेच्छुद्धभावेन चेतसा॥ १९

sthitaṃ vrajantamāsīnaṃ śayānaṃ vā guhāśayam|

prekṣaṇīyehitaṃ dhyāyecchuddhabhāvena cetasā|| 19

अर्थ

भगवान्‌की लीलाएँ बड़ी दर्शनीय हैं; अतः अपनी रुचिके अनुसार खड़े हुए, चलते हुए, बैठे हुए, पौढ़े हुए अथवा अन्तर्यामीरूपमें स्थित हुए उनके स्वरूपका विशुद्ध भावयुक्त चित्तसे चिन्तन करे॥ १९॥✎ 327

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #327 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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