श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.20

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

तस्मिँल्लब्धपदं चित्तं सर्वावयवसंस्थितम्।

विलक्ष्यैकत्र संयुज्यादंगे भगवतो मुनिः॥ २०

tasmim̐llabdhapadaṃ cittaṃ sarvāvayavasaṃsthitam|

vilakṣyaikatra saṃyujyādaṃge bhagavato muniḥ|| 20

अर्थ

इस प्रकार योगी जब यह अच्छी तरह देख ले कि भगवद्विग्रहमें चित्तकी स्थिति हो गयी, तब वह उनके समस्त अंगोंमें लगे हुए चित्तको विशेष रूपसे एक-एक अंगमें लगावे॥ २०॥✎ 327

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #327 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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