श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.28

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

कौमोदकीं भगवतो दयितां स्मरेत

दिग्धामरातिभटशोणितकर्दमेन ।

मालां मधुव्रतवरूथगिरोपघुष्टां

चैत्यस्य तत्त्वममलं मणिमस्य कण्ठे॥ २८

kaumodakīṃ bhagavato dayitāṃ smareta

digdhāmarātibhaṭaśoṇitakardamena |

mālāṃ madhuvratavarūthagiropaghuṣṭāṃ

caityasya tattvamamalaṃ maṇimasya kaṇṭhe|| 28

अर्थ

फिर विपक्षी वीरोंके रुधिरसे सनी हुई प्रभुकी प्यारी कौमोदकी गदाका, भौंरोंके शब्दसे गुंजायमान वनमालाका और उनके कण्ठमें सुशोभित सम्पूर्ण जीवोंके निर्मलतत्त्वरूप कौस्तुभमणिका ध्यान करे*॥ २८॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    ‘आत्मानमस्य जगतो निर्लेपमगुणामलम्। विभर्ति कौस्तुभमणिं स्वरूपं भगवान् हरिः॥’

    अर्थात् इस जगत‍्की निर्लेप, निर्गुण, निर्मल तथा स्वरूपभूत आत्माको कौस्तुभमणिके रूपमें भगवान् धारण करते हैं।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 377)

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