श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.29

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

भृत्यानुकम्पितधियेह गृहीतमूर्तेः

सञ्चिन्तयेद्भगवतो वदनारविन्दम्।✎ 1014

यद्विस्फुरन्मकरकुण्डलवल्गितेन

विद्योतितामलकपोलमुदारनासम् ॥ २९

bhṛtyānukampitadhiyeha gṛhītamūrteḥ

sañcintayedbhagavato vadanāravindam|

yadvisphuranmakarakuṇḍalavalgitena

vidyotitāmalakapolamudāranāsam || 29

अर्थ

भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही यहाँ साकाररूप धारण करनेवाले श्रीहरिके मुखकमलका ध्यान करे, जो सुघड़ नासिकासे सुशोभित है और झिलमिलाते हुए मकराकृत कुण्डलोंके हिलनेसे अतिशय प्रकाशमान स्वच्छ कपोलोंके कारण बड़ा ही मनोहर जान पड़ता है॥ २९॥✎ 1961

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1014 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): संञ्च‌िन्तयेद्भगवतो → सञ्चिन्तयेद्भगवतो
  • #1961 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): सुधड़ → सुघड़

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