श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.39

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

यथा पुत्राच्च वित्ताच्च पृथङ्मर्त्यः प्रतीयते।

अप्यात्मत्वेनाभिमताद्देहादेः पुरुषस्तथा॥ ३९

yathā putrācca vittācca pṛthaṅmartyaḥ pratīyate|

apyātmatvenābhimatāddehādeḥ puruṣastathā|| 39

अर्थ

जिस प्रकार अत्यन्त स्नेहके कारण पुत्र और धनादिमें भी साधारण जीवोंकी आत्मबुद्धि रहती है, किन्तु थोड़ा-सा विचार करनेसे ही वे उनसे स्पष्टतया अलग दिखायी देते हैं, उसी प्रकार जिन्हें यह अपना आत्मा मान बैठा है, उन देहादिसे भी उनका साक्षी पुरुष पृथक् ही है॥ ३९॥✎ 332 333

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #332 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #333 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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