श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.40

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

यथोल्मुकाद्विस्फुलिंगाद्धूमाद्वापि स्वसम्भवात्।

अप्यात्मत्वेनाभिमताद्यथाग्‍निः पृथगुल्मुकात्॥ ४०

yatholmukādvisphuliṃgāddhūmādvāpi svasambhavāt|

apyātmatvenābhimatādyathāgniḥ pṛthagulmukāt|| 40

अर्थ

जिस प्रकार जलती हुई लकड़ीसे, चिनगारीसे, स्वयं अग्‍निसे ही प्रकट हुए धूएँसे तथा अग्‍निरूप मानी जानेवाली उस जलती हुई लकड़ीसे भी अग्‍नि वास्तवमें पृथक् ही है—उसी प्रकार भूत, इन्द्रिय और अन्तःकरणसे उनका साक्षी आत्मा अलग है तथा जीव कहलानेवाले उस आत्मासे भी ब्रह्म भिन्‍न है और प्रकृतिसे उसके संचालक पुरुषोत्तम भिन्‍न हैं॥ ४०-४१॥✎ 332 333

यह अर्थ श्लोक 40–41 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #332 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #333 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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