॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.28.4
अहिंसा सत्यमस्तेयं यावदर्थपरिग्रहः।
ब्रह्मचर्यं तपः शौचं स्वाध्यायः पुरुषार्चनम्॥ ४
ahiṃsā satyamasteyaṃ yāvadarthaparigrahaḥ|
brahmacaryaṃ tapaḥ śaucaṃ svādhyāyaḥ puruṣārcanam|| 4
अर्थ
मन, वाणी और शरीरसे किसी जीवको न सताना, सत्य बोलना, चोरी न करना, आवश्यकतासे अधिक वस्तुओंका संग्रह न करना, ब्रह्मचर्यका पालन करना, तपस्या करना (धर्मपालनके लिये कष्ट सहना), बाहर-भीतरसे पवित्र रहना, शास्त्रोंका अध्ययन करना, भगवान्की पूजा करना,॥ ४॥✎ 324