श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.4

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

अहिंसा सत्यमस्तेयं यावदर्थपरिग्रहः।

ब्रह्मचर्यं तपः शौचं स्वाध्यायः पुरुषार्चनम्॥ ४

ahiṃsā satyamasteyaṃ yāvadarthaparigrahaḥ|

brahmacaryaṃ tapaḥ śaucaṃ svādhyāyaḥ puruṣārcanam|| 4

अर्थ

मन, वाणी और शरीरसे किसी जीवको न सताना, सत्य बोलना, चोरी न करना, आवश्यकतासे अधिक वस्तुओंका संग्रह न करना, ब्रह्मचर्यका पालन करना, तपस्या करना (धर्मपालनके लिये कष्ट सहना), बाहर-भीतरसे पवित्र रहना, शास्त्रोंका अध्ययन करना, भगवान्‌की पूजा करना,॥ ४॥✎ 324

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #324 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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