श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.5

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

मौनं सदाऽऽसनजयस्थैर्यं प्राणजयः शनैः।

प्रत्याहारश्चेन्द्रियाणां विषयान्मनसा हृदि॥ ५

maunaṃ sadā''sanajayasthairyaṃ prāṇajayaḥ śanaiḥ|

pratyāhāraścendriyāṇāṃ viṣayānmanasā hṛdi|| 5

अर्थ

वाणीका संयम करना, उत्तम आसनोंका अभ्यास करके स्थिरतापूर्वक बैठना, धीरे-धीरे प्राणायामके द्वारा श्वासको जीतना, इन्द्रियोंको मनके द्वारा विषयोंसे हटाकर अपने हृदयमें ले जाना॥ ५॥✎ 325

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #325 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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