मूलाधार आदि किसी एक केन्द्रमें मनके सहित प्राणोंको स्थिर करना, निरन्तर भगवान्की लीलाओंका चिन्तन और चित्तको समाहित करना॥ ६॥✎ 325
स्वधिष्ण्यानामेकदेशे मनसा प्राणधारणम्।
वैकुण्ठलीलाभिध्यानं समाधानं तथाऽऽत्मनः॥ ६
मूलाधार आदि किसी एक केन्द्रमें मनके सहित प्राणोंको स्थिर करना, निरन्तर भगवान्की लीलाओंका चिन्तन और चित्तको समाहित करना॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.28.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 374) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/28/6/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)