श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.29.10

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

कर्मनिर्हारमुद्दिश्य परस्मिन् वा तदर्पणम्।

यजेद्यष्टव्यमिति वा पृथग्भावः स सात्त्विकः॥ १०

karmanirhāramuddiśya parasmin vā tadarpaṇam|

yajedyaṣṭavyamiti vā pṛthagbhāvaḥ sa sāttvikaḥ|| 10

अर्थ

जो व्यक्ति पापोंका क्षय करनेके लिये, परमात्माको अर्पण करनेके लिये और पूजन करना कर्तव्य है—इस बुद्धिसे मेरा भेदभावसे पूजन करता है, वह सात्त्विक भक्त है॥ १०॥

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