yajedyaṣṭavyamiti vā pṛthagbhāvaḥ sa sāttvikaḥ|| 10
अर्थ
जो व्यक्ति पापोंका क्षय करनेके लिये, परमात्माको अर्पण करनेके लिये और पूजन करना कर्तव्य है—इस बुद्धिसे मेरा भेदभावसे पूजन करता है, वह सात्त्विक भक्त है॥ १०॥
कर्मनिर्हारमुद्दिश्य परस्मिन् वा तदर्पणम्।
यजेद्यष्टव्यमिति वा पृथग्भावः स सात्त्विकः॥ १०
जो व्यक्ति पापोंका क्षय करनेके लिये, परमात्माको अर्पण करनेके लिये और पूजन करना कर्तव्य है—इस बुद्धिसे मेरा भेदभावसे पूजन करता है, वह सात्त्विक भक्त है॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.29.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 381) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/29/10/