श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.29.9

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

विषयानभिसन्धाय यश ऐश्‍वर्यमेव वा।

अर्चादावर्चयेद्यो मां पृथग्भावः स राजसः॥ ९

viṣayānabhisandhāya yaśa aiśvaryameva vā|

arcādāvarcayedyo māṃ pṛthagbhāvaḥ sa rājasaḥ|| 9

अर्थ

जो पुरुष विषय, यश और ऐश्‍वर्यकी कामनासे प्रतिमादिमें मेरा भेदभावसे पूजन करता है, वह राजस भक्त है॥ ९॥✎ 334

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #334 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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