श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.29.8

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

अभिसन्धाय यो हिंसां दम्भं मात्सर्यमेव वा२।

संरम्भी भिन्‍नदृग्भावं मयि कुर्यात्स तामसः॥ ८

abhisandhāya yo hiṃsāṃ dambhaṃ mātsaryameva vā|

saṃrambhī bhinnadṛgbhāvaṃ mayi kuryātsa tāmasaḥ|| 8

अर्थ

जो भेददर्शी क्रोधी पुरुष हृदयमें हिंसा, दम्भ अथवा मात्सर्यका भाव रखकर मुझसे प्रेम करता है, वह मेरा तामस भक्त है॥ ८॥✎ 334

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—च।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 380)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #334 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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