श्रीभगवान्ने कहा—माताजी! साधकोंके भावके अनुसार भक्तियोगका अनेक प्रकारसे प्रकाश होता है, क्योंकि स्वभाव और गुणोंके भेदसे मनुष्योंके भावमें भी विभिन्नता आ जाती है॥ ७॥✎ 334
भक्तियोगो बहुविधो मार्गैर्भामिनि भाव्यते।
स्वभावगुणमार्गेण पुंसां भावो विभिद्यते॥ ७
श्रीभगवान्ने कहा—माताजी! साधकोंके भावके अनुसार भक्तियोगका अनेक प्रकारसे प्रकाश होता है, क्योंकि स्वभाव और गुणोंके भेदसे मनुष्योंके भावमें भी विभिन्नता आ जाती है॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.29.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 380) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/29/7/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#334 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने