श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—कुरुश्रेष्ठ विदुरजी! माताके ये मनोहर वचन सुनकर महामुनि कपिलजीने उनकी प्रशंसा की और जीवोंके प्रति दयासे द्रवीभूत हो बड़ी प्रसन्नताके साथ उनसे इस प्रकार बोले—॥ ६॥
इति मातुर्वचः श्लक्ष्णं प्रतिनन्द्य महामुनिः।
आबभाषे कुरुश्रेष्ठ प्रीतस्तां करुणार्दितः॥ ६
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—कुरुश्रेष्ठ विदुरजी! माताके ये मनोहर वचन सुनकर महामुनि कपिलजीने उनकी प्रशंसा की और जीवोंके प्रति दयासे द्रवीभूत हो बड़ी प्रसन्नताके साथ उनसे इस प्रकार बोले—॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.29.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 380) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/29/6/