श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.29.45

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

सोऽनन्तोऽन्तकरः कालोऽनादिरादिकृदव्ययः।

जनं जनेन जनयन्मारयन्मृत्युनान्तकम्॥ ४५

so'nanto'ntakaraḥ kālo'nādirādikṛdavyayaḥ|

janaṃ janena janayanmārayanmṛtyunāntakam|| 45

अर्थ

यह अविनाशी काल स्वयं अनादि किन्तु दूसरोंका आदिकर्ता (उत्पादक) है तथा स्वयं अनन्त होकर भी दूसरोंका अन्त करनेवाला है। यह पितासे पुत्रकी उत्पत्ति कराता हुआ सारे जगत‍्की रचना करता है और अपनी संहारशक्ति मृत्युके द्वारा यमराजको भी मरवाकर इसका अन्त कर देता है॥ ४५॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे
‘कापिलेयोपाख्याने’ एकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥

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