श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.30.1

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

अथ त्रिंशोऽध्यायः

देह-गेहमें आसक्त पुरुषोंकी अधोगतिका वर्णन

कपिल उवाच

तस्यैतस्य जनो नूनं नायं वेदोरुविक्रमम्।

काल्यमानोऽपि बलिनो वायोरिव घनावलिः॥ १

tasyaitasya jano nūnaṃ nāyaṃ vedoruvikramam|

kālyamāno'pi balino vāyoriva ghanāvaliḥ|| 1

अर्थ

श्रीकपिलदेवजी कहते हैं—माताजी! जिस प्रकार वायुके द्वारा उड़ाया जानेवाला मेघसमूह उसके बलको नहीं जानता, उसी प्रकार यह जीव भी बलवान् कालकी प्रेरणासे भिन्‍न-भिन्‍न अवस्थाओं तथा योनियोंमें भ्रमण करता रहता है, किन्तु उसके प्रबल पराक्रमको नहीं जानता॥ १॥✎ 337 338

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #337 शब्दोंके बीचका स्थान: सुख-सामान → सुख-सा मान
  • #338 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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