जब मन्दभाग्यके कारण इसका कोई प्रयत्न नहीं चलता और यह मन्दबुद्धि धनहीन होकर कुटुम्बके भरण-पोषणमें असमर्थ हो जाता है, तब अत्यन्त दीन और चिन्तातुर होकर लंबी-लंबी साँसें छोड़ने लगता है॥ १२॥
कुटुम्बभरणाकल्पो मन्दभाग्यो वृथोद्यमः।
श्रिया विहीनः कृपणो ध्यायञ्छ्वसिति मूढधीः॥ १२
जब मन्दभाग्यके कारण इसका कोई प्रयत्न नहीं चलता और यह मन्दबुद्धि धनहीन होकर कुटुम्बके भरण-पोषणमें असमर्थ हो जाता है, तब अत्यन्त दीन और चिन्तातुर होकर लंबी-लंबी साँसें छोड़ने लगता है॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.30.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 386) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/30/12/