श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.30.13

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

एवं स्वभरणाकल्पं तत्कलत्रादयस्तथा।

नाद्रियन्ते यथा पूर्वं कीनाशा इव गोजरम्॥ १३

evaṃ svabharaṇākalpaṃ tatkalatrādayastathā|

nādriyante yathā pūrvaṃ kīnāśā iva gojaram|| 13

अर्थ

इसे अपने पालन-पोषणमें असमर्थ देखकर वे स्त्री-पुत्रादि इसका पहलेके समान आदर नहीं करते, जैसे कृपण किसान बूढ़े बैलकी उपेक्षा कर देते हैं॥ १३॥

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