श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.30.30

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

एवं कुटुम्बं बिभ्राण उदरम्भर एव वा।

विसृज्येहोभयं प्रेत्य भुङ्क्ते तत्फलमीदृशम्॥ ३०

evaṃ kuṭumbaṃ bibhrāṇa udarambhara eva vā|

visṛjyehobhayaṃ pretya bhuṅkte tatphalamīdṛśam|| 30

अर्थ

इस प्रकार अनेक कष्ट भोगकर अपने कुटुम्बका ही पालन करनेवाला अथवा केवल अपना ही पेट भरनेवाला पुरुष उन कुटुम्ब और शरीर—दोनोंको यहीं छोड़कर मरनेके बाद अपने किये हुए पापोंका ऐसा फल भोगता है॥ ३०॥

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