tasyāṃ tasyāṃ sa labhate nirvṛtiṃ na virajyate|| 4
अर्थ
इस संसारमें यह जीव जिस-जिस योनिमें जन्म लेता है, उसी-उसीमें आनन्द मानने लगता है और उससेविरक्त नहीं होता॥ ४॥✎ 337338
जन्तुर्वै भव एतस्मिन् यां यां योनिमनुव्रजेत्।
तस्यां तस्यां स लभते निर्वृतिं न विरज्यते॥ ४
इस संसारमें यह जीव जिस-जिस योनिमें जन्म लेता है, उसी-उसीमें आनन्द मानने लगता है और उससेविरक्त नहीं होता॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.30.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 385) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/30/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)