यह भगवान्की मायासे ऐसा मोहित हो रहा है कि कर्मवश नारकी योनियोंमें जन्म लेनेपर भी वहाँके विष्ठा आदि भोगोंमें ही सुख माननेके कारण उसे भी छोड़ना नहीं चाहता॥ ५॥✎ 337338
नरकस्थोऽपि देहं वै न पुमांस्त्यक्तुमिच्छति।
नारक्यां निर्वृतौ सत्यां देवमायाविमोहितः॥ ५
यह भगवान्की मायासे ऐसा मोहित हो रहा है कि कर्मवश नारकी योनियोंमें जन्म लेनेपर भी वहाँके विष्ठा आदि भोगोंमें ही सुख माननेके कारण उसे भी छोड़ना नहीं चाहता॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.30.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 385) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/30/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)