जीव कहता है—मैं बड़ा अधम हूँ; भगवान्ने मुझे जो इस प्रकारकी गति दिखायी है, वह मेरे योग्य ही है। वे अपनी शरणमें आये हुए इस नश्वर जगत्की रक्षाके लिये ही अनेक प्रकारके रूप धारण करते हैं; अतः मैं भी भूतलपर विचरण करनेवाले उन्हींके निर्भय चरणारविन्दोंकी शरण लेता हूँ॥ १२॥✎ 342
तस्योपसन्नमवितुं जगदिच्छयात्त-
नानातनोर्भुवि चलच्चरणारविन्दम्।
सोऽहं व्रजामि शरणं ह्यकुतोभयं मे
येनेदृशी गतिरदर्श्यसतोऽनुरूपा॥ १२
जीव कहता है—मैं बड़ा अधम हूँ; भगवान्ने मुझे जो इस प्रकारकी गति दिखायी है, वह मेरे योग्य ही है। वे अपनी शरणमें आये हुए इस नश्वर जगत्की रक्षाके लिये ही अनेक प्रकारके रूप धारण करते हैं; अतः मैं भी भूतलपर विचरण करनेवाले उन्हींके निर्भय चरणारविन्दोंकी शरण लेता हूँ॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.31.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 390) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/31/12/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)