श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.13

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

यस्त्वत्र बद्ध इव कर्मभिरावृतात्मा

भूतेन्द्रियाशयमयीमवलम्ब्य मायाम्।

आस्ते विशुद्धमविकारमखण्डबोध-

मातप्यमानहृदयेऽवसितं नमामि॥ १३

yastvatra baddha iva karmabhirāvṛtātmā

bhūtendriyāśayamayīmavalambya māyām|

āste viśuddhamavikāramakhaṇḍabodha-

mātapyamānahṛdaye'vasitaṃ namāmi|| 13

अर्थ

जो मैं(जीव) इस माताके उदरमें देह, इन्द्रिय और अन्तःकरणरूपा मायाका आश्रय कर पुण्य-पापरूप कर्मोंसे आच्छादित रहनेके कारण बद्धकी तरह हूँ, वही मैं यहीं अपने सन्तप्त हृदयमें प्रतीत होनेवाले उन विशुद्ध (उपाधिरहित), अविकारी और अखण्ड बोधस्वरूप परमात्माको नमस्कार करता हूँ॥ १३॥✎ 342

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #342 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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